लखनऊ।
राजधानी के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान King George's Medical University (केजीएमयू) एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इस बार मामला किसी आम नागरिक का नहीं, बल्कि एक पत्रकार के परिवार से जुड़ा है—और आरोप इतने गंभीर हैं कि सिस्टम की संवेदनहीनता को उजागर करते हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, पत्रकार गीतांजलि सिंह के पिता दुर्गा प्रसाद को गंभीर हालत में केजीएमयू में भर्ती कराया गया था। परिजनों का आरोप है कि मरीज लगातार तीन दिनों तक ब्लीडिंग से जूझता रहा, लेकिन ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों और स्टाफ ने समय रहते न तो समुचित उपचार किया और न ही स्थिति की गंभीरता को प्राथमिकता दी।
परिवार का कहना है कि उन्होंने बार-बार अस्पताल प्रशासन और चिकित्सकों को मरीज की बिगड़ती हालत से अवगत कराया, लेकिन हर बार उन्हें केवल आश्वासन ही मिला—कार्रवाई नहीं। सवाल यह है कि क्या सरकारी अस्पतालों में अब मरीज की जान से ज्यादा “प्रोटोकॉल” अहम हो गया है?
लगातार खून बहने के कारण दुर्गा प्रसाद की हालत बिगड़ती गई और अंततः उन्होंने दम तोड़ दिया। परिजनों का साफ कहना है—“अगर समय पर इलाज मिलता, तो आज वो हमारे बीच होते।”
यह कोई पहली घटना नहीं है जब केजीएमयू पर लापरवाही के आरोप लगे हों। लेकिन हर बार जांच के नाम पर फाइलें दब जाती हैं और जिम्मेदार लोग बच निकलते हैं। आखिर कब तक मरीजों की जान यूं ही जाती रहेगी?
पत्रकार गीतांजलि सिंह इस समय गहरे शोक और पीड़ा में हैं, लेकिन उनका दर्द सिर्फ निजी नहीं—यह उस व्यवस्था पर सवाल है जो “जीवन रक्षक” होने का दावा करती है।
परिजनों ने इस पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेता है या फिर यह भी “एक और खबर” बनकर रह जाएगी।
अटल सत्य सवाल उठाता है:
👉 क्या केजीएमयू में मरीज सुरक्षित हैं?
👉 क्या लापरवाही पर कोई जिम्मेदारी तय होगी?
👉 या फिर सिस्टम यूं ही “मौन” बना रहेगा?
(अटल सत्य टी वी न्यूज 24 — सच जो चुभे, वही असली खबर)



कोई टिप्पणी नहीं: