अलीगढ़ स्वास्थ्य विभाग: 118 नियुक्तियां और 'लापता'
फाइलें— भ्रष्टाचार का बड़ा खेल या महज लापरवाही?अलीगढ़ (दीपक भारद्वाज): सरकारी विभागों में 'फाइलें गुम होना' अक्सर किसी बड़े सच को दफन करने का पुराना तरीका माना जाता है। लेकिन जब मामला 118 परिवारों के भविष्य और सरकारी खजाने से जुड़ी नियुक्तियों का हो, तो यह 'गुमशुदगी' सीधे तौर पर सिस्टम की नीयत पर सवाल खड़ा करती है। अलीगढ़ स्वास्थ्य विभाग में वर्ष 2012 में हुई संविदा भर्तियों का जिन्न एक बार फिर बाहर आ गया है, जिसने विभाग की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
क्या है पूरा प्रकरण?
मामला वर्ष 2012 का है, जब अलीगढ़ स्वास्थ्य विभाग में 30 डॉक्टरों सहित कुल 118 पदों पर संविदा कर्मियों की भर्ती की गई थी। सरकारी नियमावली के अनुसार, ऐसी नियुक्तियों के लिए विज्ञापन जारी करना, इंटरव्यू बोर्ड का गठन और चयन मेरिट की फाइलों का सुरक्षित होना अनिवार्य है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जब इन भर्तियों की पारदर्शिता पर आरटीआई (RTI) के जरिए जवाब मांगा गया, तो विभाग ने हाथ खड़े करते हुए कह दिया— "रिकॉर्ड गायब है!"
अजीबोगरीब दलील: शिफ्टिंग में खो गए दस्तावेज
मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) कार्यालय की ओर से तर्क दिया गया है कि वर्ष 2015 में जब कार्यालय की शिफ्टिंग हुई थी, उसी दौरान ये महत्वपूर्ण दस्तावेज संभवतः नष्ट हो गए या खो गए। सवाल यह उठता है कि क्या 118 लोगों की नियुक्ति प्रक्रिया इतनी मामूली थी कि उसे रद्दी समझकर छोड़ दिया गया? आखिर इन दस्तावेजों के रखरखाव के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और बाबुओं पर अब तक जवाबदेही तय क्यों नहीं की गई?
सूचना आयोग की सख्ती के बाद भी विभाग 'मौन'
यह मामला राज्य सूचना आयोग की चौखट तक भी पहुँचा। आयोग ने इस लापरवाही पर कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए धारा 20 के तहत कार्रवाई की चेतावनी भी दी। लेकिन हकीकत यह है कि एक साल से अधिक का समय बीत जाने और दर्जनों पेशियों के बावजूद, न तो वह 'खोया' हुआ रिकॉर्ड मिला और न ही किसी दोषी पर गाज गिरी।
सिस्टम से 'अटल सत्य' टीवी न्यूज़ 24 के कुछ चुभते सवाल:
विज्ञापन का रहस्य: यदि नियुक्तियां निष्पक्ष थीं, तो वह विज्ञापन कहाँ है जो अखबारों में जारी किया गया था?
चयन प्रक्रिया: इंटरव्यू बोर्ड में कौन-कौन शामिल था और किस मेरिट के आधार पर अभ्यर्थियों का चयन हुआ?
दबाव की राजनीति: पीड़ित पक्ष का आरोप है कि शिकायत वापस लेने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। आखिर विभाग किसे बचाने की कोशिश कर रहा है?
निष्कर्ष
फाइलों का 'लापता' होना अक्सर इस बात का संकेत होता है कि पर्दे के पीछे बहुत कुछ ऐसा है जिसे सामने आने से रोका जा रहा है। अलीगढ़ स्वास्थ्य विभाग की यह खामोशी चीख-चीखकर कह रही है कि शायद नियमों को ताक पर रखकर चहेतों को रेवड़ियां बांटी गई थीं।
अब देखना यह होगा कि क्या उत्तर प्रदेश का स्वास्थ्य मंत्रालय और शासन इस मामले का संज्ञान लेकर उन 118 नियुक्तियों की उच्चस्तरीय जांच कराएगा, जिनकी फाइलें वर्तमान में 'साजिश के मलबे' में दबी नजर आ रही हैं।
ब्यूरो रिपोर्ट: दीपक भारद्वाज अलीगढ़।



कोई टिप्पणी नहीं: