आशा बहुओं का धैर्य जवाब दे रहा: मुख्यमंत्री को पत्र
भेज याद दिलाई मानदेय वृद्धि की घोषणा, बड़े आंदोलन की चेतावनीलखनऊ | अटल सत्य टी वी न्यूज 24 रिपोर्टर: अटल बिहारी शर्मा
दिनांक: 26 अप्रैल, 2026
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की लाखों आशा बहुओं, संगिनियों और आंगनबाड़ी कार्यकर्त्रियों के बकाया मानदेय और मानदेय वृद्धि की मांग को लेकर अब राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद ने मोर्चा खोल दिया है। परिषद के अध्यक्ष जे.एन. तिवारी ने आज मुख्यमंत्री के आधिकारिक ई-मेल पोर्टल पर पत्र भेजकर सदन में की गई घोषणाओं को याद दिलाया और तत्काल मानदेय बढ़ाए जाने की मांग की।
मुख्यमंत्री को भेजा गया ज्ञापन: ₹18,000 न्यूनतम मानदेय की मांग
जे.एन. तिवारी ने मुख्यमंत्री को भेजे अपने ज्ञापन में स्पष्ट रूप से कहा कि सदन में सरकार ने मानदेय वृद्धि का आश्वासन दिया था, लेकिन ज़मीनी स्तर पर अब तक कुछ नहीं बदला। उन्होंने मांग की है कि:
आशा बहुओं के लिए ₹18,000 का न्यूनतम मानदेय निश्चित किया जाए।
वर्तमान में मिल रहे 2 से 2.5 हजार रुपए के अल्प मानदेय को बढ़ाया जाए, क्योंकि इस महंगाई में इतने कम पैसों में घर चलाना असंभव है।
विगत दो माह से रुका हुआ बकाया मानदेय तत्काल जारी किया जाए।
काम का बोझ भारी, पर जेब खाली
परिषद के अध्यक्ष ने बताया कि महिला सशक्तिकरण के दावों के बीच आशा बहुएं उपेक्षित जीवन जीने को मजबूर हैं। उन्होंने कहा कि:
"जनगणना से लेकर वोटर लिस्ट तैयार करने तक, और टीकाकरण से लेकर फाइलेरिया व टीबी के मरीजों की खोज तक—सैकड़ों कार्य आशाओं के कंधों पर हैं, लेकिन प्रोत्साहन राशि के नाम पर उन्हें कुछ नहीं मिल रहा। कई घरों में तो चूल्हा जलना भी मुश्किल हो गया है।"
चुनावी वर्ष में सरकार को भारी पड़ सकती है नाराजगी
संयुक्त परिषद की महामंत्री अरुणा शुक्ला ने सरकार को घेरेते हुए कहा कि महिला सशक्तिकरण का असली अर्थ महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है। उन्होंने आरोप लगाया कि विभिन्न सरकारी विभागों में संविदा महिला कर्मियों और आशाओं का शोषण हो रहा है।
परिषद ने सख्त लहजे में चेतावनी दी है कि:
2,39,000 आशा बहुएं प्रदेश के हर घर और हर गांव से जुड़ी हैं, उनकी नाराजगी सरकार के लिए भारी पड़ेगी।
यदि अप्रैल माह के भीतर मानदेय पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो आशा हेल्थ वर्कर्स एसोसिएशन की अध्यक्ष कुसुम लता के नेतृत्व में प्रदेश भर की आशाएं 'आर-पार' के संघर्ष और आंदोलन के लिए सड़कों पर उतरेंगी।
राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद ने स्पष्ट कर दिया है कि चुनावी वर्ष होने के कारण आशाओं की उपेक्षा करना सत्ता पक्ष के लिए रणनीतिक रूप से भी नुकसानदेह साबित हो सकता है।
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